*दोस्त दोस्त ना रहा – भाग 1*

दोपहर का समय था, स्कूल की छुट्टी हो गई थी, सभी बच्चे अपने-अपने घर की तरफ जाने लगे कि तभी निशा को उसकी एक सहेली ने पूछा………………………….।

अंजलि : हेल्लो….।। तुम कैसी हो?

निशा : मै ठीक हूँ । तुम कैसी हो?

अंजलि : मै भी ठीक हूँ । क्या तुम मेरी एक छोटी सी मदद करोगी?

निशा: हाँ क्यू नहीं ।

अंजलि : मेरी एक सहेली आज छुट्टी पर है और मुझे उसे नोट्स देने हैं। क्या तुम मेरे साथ उसके घर चलोगी?

निशा : क्यों नहीं।

निशा और अंजलि दोनों उस दिन स्कूल की छुट्टी होने के बाद अंजलि की दोस्त कामिनी के घर जाते हैं । जैसे ही दोनों कामिनी के घर पहुचते है उसकी मम्मी दरवाजा खोलती है ।

अंजलि  और निशा : अंटी जी नमस्ते …!

अंटी : नमस्ते बेटा ।

अंजलि : अंटी कामिनी है?

अंटी : हाँ है… अंदर आ जाओ।

दोनों अन्दर जाते हैं, अंजलि अपनी दोस्त कामिनी की तबियत का जायजा लेती है और उसे नोट्स देती है । अंजलि और कामिनी के बातें चल रही थी इसी दोरान अंजलि, निशा का परिचय कामिनी से करवाती है।

अंजलि : कामिनी यह निशा है, सेक्शन “अ” में पढती है ।

कामिनी : हाँ मैंने निशा को स्कूल में देखा है ।

हेल्लो निशा (कामिनी मुस्कुराते हुए)………..

निशा: हेल्लो ….।।।।

कुछ दिनों बाद जब कामिनी की तबियत ठीक हो जाती है तब वह स्कूल जाना शुरू करती है और तभी उसकी मुलाकात निशा से होती है।

कामिनी: हेल्लो निशा……।

धन्यवाद् तुम अंजलि के साथ मेरे घर नोट्स देने आई ।

निशा : कोई बात नही, तुम धन्यवाद मत बोलो ।

कामिनी : क्या हम दोस्त बन सकते हैं….?

निशा : क्यू नहीं । हम अब से दोस्त हैं।

अब कामनी और निशा दोनों आपस में खूब बातें करते थे, साथ खेलते थे, घूमते थे। दोनों को एक दुसरे का साथ इतना अच्छा लगने लगा कि कुछ ही दिनों में वो बहुत ही अच्छे और करीबी दोस्त बन गए। उन दोनों का एक दुसरे के घर आना जाना भी शुरू हो गया।

निशा एक बहुत ही भावुक लड़की थी, वह हमेशा कामिनी का साथ देती थी और यही आशा रखती थी कि जरूरत पड़ने पर कामिनी भी उसका साथ जरुर देगी। निशा को अपनी करीबी दोस्त कामिनी पर विशवास था।

देखते ही देखते बोर्ड परीक्षा का समय नजदीक आने लगा। दोनों पढाई में जुट गए पर दोनों को यह डर भी था कि बोर्ड परीक्षा के बाद उन दोनों को अपना स्कूल बदलना पड़ेगा और कहीं वो अलग-अलग स्कूल में न चले जायें । एक ही स्कूल में दाखिला लेने के लिए उन्होंने जोर शोर से परीक्षा की तयारी करनी शुरू कर दी जैसे ही परीक्षा समाप्त हुई निशा और कामिनी खेल-कूद और मोज मस्ती में लग गए।

कुछ दिनों बाद……………………………………..

निशा (फ़ोन पर): हेल्लो कामिनी ।

कामिनी : हेल्लो……!!! तुम कैसे हो ?

निशा: मै ठीक हूँ ।  तुम कैसे हो ?

कामिनी: मै भी ठीक हूँ।

निशा : आज परीक्षा का परिणाम आने वाला है, मुझे तो डर लग रहा है।

कामिनी : अब तुम तो मत ही डरो। अगर तुम्हारे जैसे अवल आने वाले डरेंगे तो बाकि विद्यार्थियों का क्या होगा?

निशा : ठीक है। मेरा रोल नंबर तुमको पता ही है, जैसे ही परिणाम आ जाये मुझे फ़ोन पर बता देना।

कामिनी: ठीक है।

थोड़ी देर बाद……………………………

कामिनी : हेल्लो निशा ………!

निशा: हेल्लो…….!!

कामिनी : तुमने 77% अंक प्राप्त किए।

निशा: और तुमने?

कामिनी: 70%।

निशा: मुबारक हो।

कुछ ही दिनों बाद दोनों ने आगे की पढाई के लिए फॉर्म भरा। निशा और कामिनी को एक ही स्कूल में दाखिला तो मिल गया पर दोनों के विषय अलग होने के कारण वो लोग अलग-अलग सेक्शन में चले गये। निशा के नए स्कूल में और उसके ही सेक्शन में एक ऐसे लड़की (ममता) भी थी जो पहले से निशा के साथ उसके पुराने स्कूल में पड़ती थी और कामिनी को भी जानती थी।

निशा और कामिनी का सेक्शन अलग होने की वजह से अब वो दोनों सिर्फ लंच के समय ही मिल पाते थी। एक दिन निशा और कामिनी लंच के समय मिले और बातें करने लगे तभी अचानक कामिनी ने कुछ ऐसा कहा कि निशा हैरान हो गई:-

कामिनी: तुम्हारे सेक्शन में जो ममता पढती है…………!

निशा : हाँ पढती है। क्या हुआ उसे?

कामिनी: वो बोल रही थी कि निशा ने मेरे स्कूल बैग से पैसे चोरी किए हैं।

निशा: ये क्या बकवास है। कामिनी क्या तुम ममता पर विश्वास करती हो ?

कामिनी: नहीं-नहीं बिलकुल नहीं। मैंने तो तुमको सिर्फ वो बताया जो ममता ने मुझे बोला।

निशा: मुझे इस बारे में ममता से बात करनी है। मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया और मै इतना बड़ा इलज़ाम अपने ऊपर नहीं ले सकती। कामिनी तुमको मेरी मदद करनी पड़ेगी और ममता के सामने ये बोलना पड़ेगा कि उसने ही तुमको ये बात बताई है कि उसके बैग से पैसे मैंने चोरी किए है।

कामिनी: हाँ ठीक है। पर अभी नहीं, अभी मेरी क्लास का समय हो गाया।

निशा: ठीक है।

अगले दिन स्कूल में लंच के समय……………………………

निशा: ममता क्या तुमने कामिनी को यह बोला है कि मैंने तुम्हारे स्कूल बैग से पैसे चोरी किए है?

ममता: नहीं।

निशा : झूठ मत बोलो मुझे कामिनी ने सब कुछ सच सच बता दिया है और मुझे कामिनी पर पूरा विश्वास है।

ममता: नहीं मैंने ऐसा कुछ नही बोला।

निशा: ठीक है। रुको मै अभी कामिनी को बुलाती हूँ अब वो ही बताएगी सब कुछ।

निशा, कामिनी के पास गई जो अपनी कुछ अन्य सहेलियों से बातें कर रही थी …………………………..

कामिनी तुम अभी मेरे साथ चलो, मुझे कल वाली बात ममता के सामने पूछनी है।

कामिनी : एक मिनट मैं आती हूँ ।

निशा : मै तुम्हारा इंतज़ार कर रह हूँ।

      10 मिनट बाद…………..

निशा : कामिनी मुझे तुम्हारी मदद की जरूरत है। मेरे साथ जल्दी चलो, लंच का समय ख़तम होने वाला है।

कामिनी : हाँ हाँ मै आ रही हूँ………

निशा: इतनी बड़ी बात हैं मेरे लिए और शायद तुम्हारे लिए भी कि तुम्हारी इतनी करीबी सहेली पर किसी ने इतना बड़ा इलज़ाम लगाया है और मेरी मदद करने की जगह तुम यहाँ अपनी सहेलियों के साथ बातें कर रही हो। क्या ये बात तुम्हारे लिए कोई महत्व नहीं रखती?

कामिनी : हाँ बड़ी बात है मेरे लिए भी, पर अभी यहाँ इससे भी ज्यादा महतवपूर्ण बात चल रही है। तुम अभी यहाँ से जाओ।

निशा: इस बात से जयादा महतवपूर्ण तुम्हारे लिए क्या हो गया कि तुम इतनी गहरी दोस्ती के लिए भी तुम्हे इतना सोचना पड़ रहा है। कामिनी तुम इतना सोच रही हो मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा। मुझे तो तुम्हारे चेहरे पर ममता के प्रति कोई गुस्सा ही नज़र नहीं आ रहा। मुझे तो ऐसा लग रहा है कि तुम बस यही इतंजार कर रही हो कि कब लंच का समय खत्म हो और मै यहाँ से जाऊ। ठीक है ……….!!! कामिनी जैसे तुम्हारी मर्ज़ी पर मुझे ये बात हमेशा याद रहेगी कि तुमने मेरा साथ न दिया।

एक बात और सुन लो कामिनी अगर मैं तुम्हारी जगह होती और मुझे कोई ये बोलता कि तुम्हारी सहेली कामिनी ने मेरे पैसे चोरी किए है तो मैं न जाने उसके साथ क्या करती। तुमने तो मेरे बारे में ये सब बातें सुन कर और मेरे द्वारा तुमसे मदद मागने पर भी कुछ नही किया। आज के बाद मै तुमसे कभी बात नही करुँगी। हमारी दोस्ती यहीं तक थी। अलविदा…………………………….!!!!!!!!!!!!!!!!

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*मेरे कॉलेज का पहला दिन- भाग 2*

जैसा कि “मेरे कॉलेज का पहला दिन भाग-1” कहानी में मैंने आपको बताया कि कॉलेज में पहुँचते ही मेरे और मेरे साथियों के साथ सेकंड और थर्ड ईयर के विद्यार्थियों ने रैंगिंग का सिलसिला पहले दिन से ही शुरु कर दिया था|

कॉलेज में पहले दिन की रैगिंग के बाद मैं अपने कमरे में पंहुचा | पलंग पर लेटते ही पंखे की तरफ देखते हुए मैं यह सोचने लगा कि स्कूल की लाइफ सबसे अच्छी थी, वहाँ न किसी का डर था और न ही कोई घबराहट थी, यहाँ तो खाना खाने के लिए भी पहले अपने से बड़े विद्यार्थियों से इजाज़त की प्रतीक्षा करनी पड़ती है | उस दिन मेरी माँ का महत्व मेरे जीवन में ओर भी बढ़ गया था जो मेरे कहने से पहले ही थाली में खाना परोस कर रख देती थी | किसी से दूर होने पर ही पता चलता है कि वह आपके जीवन में क्या महत्व रखता हैं I मन ही मन में अपने आप से बातें करके मेरी आँख कब लग गई मुझे पता ही न चला |

सुबह करीब 6:30 मेरी आँख खुली और मै नहाने के लिए बाथरूम की तरह चल पड़ा, वहाँ जाते ही मैंने देखा कि बाकी लोग मुझसे पहले लाइन में खड़े हैं | कॉलेज में आज क्लास का पहला दिन था और मैं देर से नहीं पहुंचना चाहता था | धक्कम-धक्का करने के बाद मेरा नंबर आया | अच्छी तरह तैयार होकर मै क्लासरूम की तरफ निकल पड़ा | जैसे ही मै क्लासरूम की बिल्डिंग के पास पंहुचा मैंने देखा कुछ दूरी पर काफी भीड़ थी और काफी जोर-जोर से चिल्लाने की आवाज़ आ रही थी | मैं और मेरे साथ जो विद्यार्थी थे हम सभी ने वहाँ से बच कर निकलने की कोशिश की परन्तु उन्होंने हमे जाने न दिया और एक लाइन बनाकर अपने पीछे आने को कहा | मैंने सोचा रैगिंग तो हो चुकी है फिर अब यह (सेकंड व थर्ड ईयर के विद्यार्थी) हमे कहाँ और क्यों लेकर जा रहे हैं……….? वह हमे एक हाल में लेकर गए और वहाँ उन्होंने हमे अपने सीनियर विद्यार्थियों को नए तरह से संबोधित करना सिखाया जिसका नाम उनकी भाषा में “NINTY MAARNA” था, जिसमे हम लोगो को अपनी कमर को 90 डिग्री तक झुका कर उन्हें सलाम करना होता था वो भी तब तक जब तक वह हमे सीधे होने के लिए न कहें जो कि मेरे लिए बड़ा अजीब सा अनुभव था |

जब रैंगिंग खत्म हुई तब तक आधा दिन बीत चुका था और हमारे लेक्चर का समय भी खत्म हो चुका था | मैं मन ही मन में सोच रहा था कि कैसे हम सभी अपने घरों से दूर ज़िन्दगी में कुछ बनने और कुछ नया सिखने आए हैं और यहाँ तो ज़िन्दगी हमे कुछ अलग ही अनुभव करा रही रही | मैं नहीं जानता था कि सभी ऐसा महसूस कर रहे हैं या मैं ही इस अजीब अनुभव के बारे में ज्यादा सोच रहा हूँ |

शाम को होस्टल में अपने दोस्तों के साथ बैठा था तभी घर से फ़ोन आया | सभी ने मेरा हाल-चाल पूछने के बाद कॉलेज के पहले दिन के अनुभव के बारे में पूछा, मुझे लगा शायद यह बात मैं अपने बड़े भैया के साथ साझा कर सकता हूँ पर यह सोच कर मैं रुक गया कि घर पर सभी परेशान हो जायेंगे | कहीं न कहीं मैं यह भी सोच रहा था कि अभी मैं ज़िन्दगी के ऐसे मोड़ पर हूँ जहाँ मुझे बहुत सी समस्याओं को खुद ही सुलझाना होगा |

उस दिन के बाद भी कॉलेज में कई बार रैगिंग हुई पर तब तक मुझमे ऐसी परिस्थितयों से निपटने की समझ आ चुकी थी |

*मेरे कॉलेज का पहला दिन- भाग 1*

जब मैंने इंटर की परीक्षा अच्छे नम्बरों से पास की तो घर में सब बहुत ही खुश थे और मुझे भी यह सोचकर बड़ी ही प्रसन्नता हो रही थी कि अब मैं भी कॉलेज जाऊंगा। मेरठ के एक कॉलेज में मुझे दाखिला मिला गया और अब वहीँ रह कर मुझे  आगे की पढाई करनी थी।

16 अगस्त 2006 का वह दिन मुझे आज भी याद है जब मैं घर से स्टेशन के लिए निकला। मेरी ट्रेन करीब 7:30 बजे की थी। मुझे स्टेशन तक छोड़ने के लिए माँ और पिता जी भी साथ आए थे। कुछ ही देर बाद ट्रेन सामने से आती हुई नज़र आई और जैसे ही मैंने ट्रेन पकड़ने के लिए कदम आगे बढ़ाया, माँ की आँखों से आंसू छलकने लगे पर पिता जी ने अपनी भावनाओ को अन्दर ही दबा रखा था, ना चाहते हुए भी भरे मन के साथ जैसे-तैसे मैंने उनसे विदा ली और आशीर्वाद लेकर निकल पड़ा।

ट्रेन अब मेरठ के लिए निकल पड़ी थी और मैं सफ़र का आनंद लेने लगा। कुछ ही घंटों के सफ़र में रात के खाने का समय हो गया था। मैंने अपने बैग से डिब्बा निकाला और माँ के हाथ का बना हुआ खाना खाने लगा। इसके बाद मैं थोडा थका हुआ महसूस करने लगा पर जैसे ही मैंने सोने की तैयारी की मुझे घबराहट होने लगी। स्कूल के दिनों में मैंने कॉलेज में पुराने विद्यार्थियों दवारा नए विद्यार्थियों के साथ होने वाली रैगिंग के बारे में सुना था और यही सोच कर मेरी नीदं जैसे हवा में उड़ गई थी।

17 अगस्त, करीब सुबह 8:30 बजे मैं हास्टल पंहुचा। नया शहर और नए लोगो को देख कर मुझे बहुत ही अजीब सा लग रहा था। वहाँ पहुँचते ही सबसे पहले मेरी मुलाकात गार्ड से हुई…….

गार्ड: फर्स्ट ईयर?

मैं: जी……………….हाँ………….(घबराते हुए) ……………………!!

गार्ड: फर्स्ट ईयर के विद्यार्थियों की बिल्डिंग बाएँ तरह है। आप दूसरी तरफ न जाएँ।

मैं : ठीक हैं …. धन्यवाद्।

मैं अपने हॉस्टल की बिल्डिंग की तरफ निकल पड़ा। वहां जाकर मैंने देखा कि एक ही कमरे में दो विद्यार्थियों के रहने की व्यवस्था की गई थी। कमरे में जाकर मैंने अपना बैग अलमारी में रखा और उत्सुकता से अपने नए पलंग का चुनाव कर अपने रूम पार्टनर का इंतजार करने लगा। करीब आधा दिन बीत जाने के बाद किसी ने कमरे का दरवाजा खटखटाया। मैंने जैसे ही दरवाजा खोला और देखा कि मेरे सामने मेरा एक पुराना मित्र अपना बैग और संदूक लेकर खड़ा था। यह सोच कर मैंने थोड़ी राहत की सांस ली कि मेरा रूम पार्टनर कोई दूसरा नही बल्कि मेरा ही एक पुराना मित्र था। ज्यादा लंबा सफ़र करने के कारण हम इतना थक चुके थे कि जैसे ही पलंग पर लेटे और कब आँख लग गई, दोनों को कुछ पता न चला। दिन ऐसे ही बीत गया और जब हमारी आँख खुली तो शाम हो चुकी थी। कमरे से बाहर निकलने पर बाकी विद्यार्थियों ने हमें बताया कि फर्स्ट ईयर के विद्यार्थियों का भोजनालय सेकंड और थर्ड ईयर के विद्यार्थियों के साथ ही है। इस बात का पता चलते ही किसी की हिम्मत न हुई कि उनके भोजनालय जाकर खाना खाते। सबको रह रह कर रैगिंग का डर सता रहा था परन्तु भूख इतनी तेज़ लगी थी कि अंततः किसी से भी रहा न गया और सभी ने एकजुट होकर भोजनालय जाकर खाना खाने का फैसला किया।

हम सभी अभी सेकंड और थर्ड ईयर के विद्यार्थियों की बिल्डिंग में पहुँचे ही थे कि पीछे से आवाज़ आई …………

फर्स्ट ईयर…………..?

हम सभी के कदम एकदम रुक गए और सभी मौन हो गए। फिर से किसी ने पीछे से आवाज़ दी………… फर्स्ट ईयर …………………..?

इस बार हम सभी ने हाँ का इशारा करते हुए सिर हिलाया………। बस फिर क्या था, रैगिंग का सिलसिला वहीँ से ही शुरू हो गया। सेकंड और थर्ड ईयर के विद्यार्थियों ने हम सभी को एक पंक्ति में खड़े होकर उनके पीछे आने के लिए कहा। हम सभी पंक्ति बनाकर उनके पीछे पीछे चलने लगे। कुछ दूर चलने के बाद वह हमे नाई की एक छोटी सी दुकान पर लेकर गए और नाई को केवल “जीरो कट” कह कर समझा दिया कि आखिर हम लोगो के साथ करना क्या है…..??

उस समय तक मैंने कभी भी जीरो कट के बारे में नही सुना था। मुझे जिज्ञासा हो रही थी कि आखिर ये जीरो कट होता क्या है………….??????? कुछ मिनट मैं सोचता रहा और जब मुझसे रहा न गया तब मैंने नाई से पूछा ……………

मैं: ये जीरो कट क्या हैं?

नाई: जब हो जाएगा तब आपको पता चल जाएगा।

उस दिन दुर्भाग्यवश मैं ही पहला विद्यार्थी था, जिसका जीरो कट किया गया। जीरो कट पूरा होने के बाद जब मैंने अपने आप को शीशे में देखा तब अपने सिर पर एक भी बाल न देख कर मुझे पहले तो बहुत बुरा महसूस हुआ पर जब मैंने बाकी विद्यार्थियों की तरफ देखा तो यह सोच कर मुझे थोडा सुकून मिला कि अब यही उन सभी के साथ होने वाला था। जब सभी विद्यार्थियों का जीरो कट हो गया तब मैं सोचने लगा, “क्या इसके पैसे भी अब हम से ही लिए जायेंगे……..?” इतने में थर्ड ईयर के एक विद्यार्थी ने नाई से पूछा “कितने पैसे हुए? ” नाई ने जवाब दिया 60 रूपए तब मेरे मन में ख्याल आया इतना सस्ता जीरो कट……….??

पर इतने पर भी उनका मन न भरा और वह हमे कॉलेज के खुले मैंदान में लेकर गए जहाँ उन्होंने हमसे दंड-बैठक, कब्बडी, मिट्टी में लोटपोट, नृत्य, संगीत और भी बहुत सी चीज़े अपने अंदाज़ में करवाई।

रैगिंग के बाद हम सब इतना थक चुके थे और सभी को जोरो की भूख लगी थी कि जैसे ही हमे खाना खाने के लिए स्वीकृति मिली, हम लोग भूखों की तरह खाने पर टूट पड़े। उस दिन खाना खाने के बाद मैं और मेरा मित्र जैसे ही कमरे में पहुँचे बस यही सोचने लगे कि अब कल क्या होगा…………??????

 

*दोस्त दोस्त ना रहा – भाग 2*

कामिनी और निशा की दोस्ती का वो आखिरी दिन था जब कामिनी ने निशा का साथ न दिया। निशा अब कामिनी से बात नहीं करती थी, यहाँ तक की लंच के समय जब कामिनी के साथ उसका सामना होता तब वह अनजान शख्स की तरह सामने से गुजर जाती। दोनों को इस बात का अफ़सोस था कि उनकी दोस्ती अब नहीं रही और कहीं न कहीं दोनों ख़ुशी के अवसर पर एक-दुसरे को याद करते।

देखते-ही-देखते दोनों ने इंटर की परीक्षा अच्छे नम्बरों से पास की। निशा और कामिनी ने अब कॉलेज के लिए आवेदन किया। दोनों के अच्छे नंबर होने के कारण उन्हें शहर के श्रेष्ठ कॉलेज में दाखिला मिल गया और दोनों फिर से एक ही क्लास में आ गए। एक ही कॉलेज में और एक ही क्लास में दो अजनबियों की तरह रहना उनके लिए मुश्किल हो रहा था। रह-रह कर दोनों को अपनी दोस्ती याद आती और बीता हुआ लम्हा जैसे उनकी आँखों के सामने आ जाता। यह जताते हुए कि दोनों को एक-दुसरे की मौजूदगी से कोई फर्क नहीं पड़ता, पता नही तीन वर्ष कैसे बीत गए………………………..?

अब परीक्षा के दिन नजदीक आ गए थे, दोनों ने तैयारी शुरू कर दी। जहाँ एक तरफ निशा अर्थशास्त्र की छात्रा थी, वही दूसरी तरफ कामिनी राजनीति-शास्त्र की छात्रा थी। परीक्षा की डेट-शीट आ गई थी। दोनों ने दिन-रात एक कर दिया, भले ही वह आपस में बात न करते थे पर एक-दुसरे से स्पर्धा उनमें आज भी थी। कुछ ही दिनों में निशा की परीक्षाएं समाप्त हो गई पर कामिनी की अंतिम परीक्षा बाकी थी और उसी परीक्षा से एक दिन पहले कामिनी के साथ गंभीर दुर्घटना घटी। अस्पताल में डॉक्टर द्वारा जाँच के दौरान हड्डी टूटने के कारण उसके दाहिने हाथ में प्लास्टर लगाया गया। कामिनी बहुत ही चिंतित थी क्यूँकि अगले दिन उसकी परीक्षा थी और अब उसे एक लेखक की जरूरत थी। उसने अपने सभी मित्रों से मदद मांगी परन्तु किसी ने भी उसका साथ न दिया और अंजलि भी शहर से बाहर थी। कामिनी को कुछ समझ नही आ रहा था, वह अपने स्टडी टेबल पर बैठी और अपनी किताबों को देखने लगी, जैसे ही उसने अपने हाथ पर चढ़े हुए प्लास्टर को देखा, यह सोचकर कि कल परीक्षा का क्या होगा…….? उसके आंखो से आंसू छलकने लगे। अब उसके पास केवल निशा का ही सहारा था, परन्तु आत्मग्लानि से भरे हुए हृदय के साथ वह निशा से बात करने की हिम्मत न जुटा पाई, तभी फ़ोन की घंटी बजी और कामिनी ने फ़ोन उठाया …………….

कामिनी: हेल्लो ……………..!!

निशा: हेल्लो कामिनी…. मैं निशा बोल रही रही हूँ…..। मुझे अंजलि ने बताया की तुम्हारा एक्सीडेंट हो गया है और तुम्हें कल की परीक्षा के लिए लेखक की जरूरत है…….? तुम ठीक तो हो न……..?

कामिनी: निशा मुझे उस दिन की गलती के लिए माफ़ कर दो………….

निशा: अरे………कोई बात नहीं, मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है।

कामिनी: कल मेरी परीक्षा है। क्या तुम मेरे लिए लिखोगी?

निशा: हाँ क्यूँ नहीं ….. तुम चिंता मत करो। मै तुम्हारी परीक्षा में सहायता करूंगी। कल सुबह 8:00 बजे मैं परीक्षा भवन के बाहर तुम्हारा इंतज़ार करूंगी…… तुम अपना ध्यान रखना।

कामिनी: धन्यवाद्………..!!!

अगले दिन दोनों परीक्षा के लिए तैयार हुए, निशा ने कामिनी के लिए लेखक का काम किया और अपनी सहेली की मुसीबत में सहायता कर यह साबित किया कि कामिनी के प्रति उसकी दोस्ती में सच्चाई और ईमानदारी थी। निशा ने कामिनी को माफ़ कर उसे गले से लगाया और फिर से वह अच्छे दोस्त बन गए।

*गूंजा का गहना*

यह कहानी करीब तीस वर्ष पुरानी है। एक गाँव में गूंजा नाम की एक लड़की रहती थी। उसका एक बड़ा भाई और तीन छोटी बहनें थी। बहनों में सबसे बड़ी होने के कारण गूंजा को बचपन में ही जिमेवारियों ने घेर लिया।
हालाँकि गूंजा अपने भाई से छोटी थी, परन्तु लड़की होने के कारण उसका विवाह सबसे पहले पास के ही एक गाँव में हो गया। जिस समय गूंजा का विवाह हुआ उस समय वह केवल सोलह बरस की थी। गूंजा को विवाह के समय ससुराल वालों की तरफ से एक गहना मिला, जो उस समय सभी लोग अपनी नई-नवेली बहु को दिया करते थे, जिसे पाकर गूंजा बहुत ही खुश हुई।
गूंजा के विवाह को दो वर्ष बीत चुके थे। वह बहुत ही खुश थी और सब कुछ बहुत ही अच्छे से चल रहा था। एक दिन गूंजा के माता-पिता उसके ससुराल अपने बड़े बेटे के विवाह का न्योता लेकर आये। गूंजा खुश थी क्यूँकि वह अपने भाई-बहनों से मिलने वाली थी। अब वह दिन-रात उस दिन का इंतजार करती थी जब उसके बड़े भाई के विवाह होना था।
भाई के विवाह से दो दिन पूर्व ही गूंजा और उसका पति उसके गाँव के लिए रावाना हुए। अपने घर पहुँच कर जब वह अपने भाई-बहनों से मिली, तब वह बहुत ही खुश हुई। उसके घर में चहल-पहल और हसी-ख़ुशी का माहौल था।
अगले दिन सभी को गणेश पूजा के लिए सुबह चार बजे उठना था। सुबह-सुबह चार बजे सभी लोग गणेश पूजा के लिए तैयार हुए। गूंजा ने भी नई साडी पहनी और वही गहना पहना जो उसे अपने ससुराल से मिला था। गणेश पूजा का शुभारंभ हुआ और पंडित जी ने श्लोक पढ़ने शुरू किये। गणेश पूजा के समापन के बाद गूंजा थोड़ी थक गई थी और उसे नींद आने लगी। वह अपने कमरे में गई और थोड़ी देर सो गई। कुछ पहर बाद जब गूंजा की आँख खुली और उसने सामने लगे शीशे में अपने आप को देखा तो वह बहुत परेशान हो गई। उसकी इस परेशानी का कारण उसके गले में गहने का न होना था। वह बहुत घबरा गई और सोचने लगी कि अब वह अपने पति को क्या कहेगी….? बिना गहने अपने ससुराल वापके कैसे जाएगी…..? उसने सबसे पहले यह बात अपनी माँ को बताई। उस समय लोग पुलिस के पास न जाकर ज्योतिष या किसी बाबा के पास जाते थे। गूंजा और उसकी माँ भी एक बाबा के पास गए और सारी बात बाबा को बताई। बाबा ने कुछ सोचा और बताया कि गूंजा का गहना उसके ही गाँव की एक पंद्रह वर्ष की लड़की ने चुराया हैं, जो चोरी वाले दिन गूंजा के साथ सोई थी। वह दोनों बाबा को धन्यवाद कर घर वापस आ गए और उस लड़की के पास गए जिसके बारे में बाबा ने बताया था। सभी गाँव वालों को जब इस बात का पता चला तो सभी वहां आ गए। गाँव वालों की भीड़ को देखकर लड़की घबरा गई और गहने के बारे में पूछने पर बोली मुझे “गूंजा दीदी का गहना बहुत अच्छा लगा और जब वह सो रही थी तभी मैंने वो गहना चोरी कर लिया“ उस लड़की ने सभी गाँव वालों की मौजुदगी में गूंजा को उसका गहना वापस किया तब जाकर गूंजा की जान में जान आई।
विवाह समारोह के समाप्त होते ही गूंजा और उसका पति सभी से विदा लेकर अपने घर वापस चले गए। इस बात के बारे में शायद ही गूंजा के ससुराल वालों को पता हो पर उसे इस बात घटना से एक बड़ी सिख मिल गई थी।