*दोस्त दोस्त ना रहा – भाग 1*

दोपहर का समय था, स्कूल की छुट्टी हो गई थी, सभी बच्चे अपने-अपने घर की तरफ जाने लगे कि तभी निशा को उसकी एक सहेली ने पूछा………………………….।

अंजलि : हेल्लो….।। तुम कैसी हो?

निशा : मै ठीक हूँ । तुम कैसी हो?

अंजलि : मै भी ठीक हूँ । क्या तुम मेरी एक छोटी सी मदद करोगी?

निशा: हाँ क्यू नहीं ।

अंजलि : मेरी एक सहेली आज छुट्टी पर है और मुझे उसे नोट्स देने हैं। क्या तुम मेरे साथ उसके घर चलोगी?

निशा : क्यों नहीं।

निशा और अंजलि दोनों उस दिन स्कूल की छुट्टी होने के बाद अंजलि की दोस्त कामिनी के घर जाते हैं । जैसे ही दोनों कामिनी के घर पहुचते है उसकी मम्मी दरवाजा खोलती है ।

अंजलि  और निशा : अंटी जी नमस्ते …!

अंटी : नमस्ते बेटा ।

अंजलि : अंटी कामिनी है?

अंटी : हाँ है… अंदर आ जाओ।

दोनों अन्दर जाते हैं, अंजलि अपनी दोस्त कामिनी की तबियत का जायजा लेती है और उसे नोट्स देती है । अंजलि और कामिनी के बातें चल रही थी इसी दोरान अंजलि, निशा का परिचय कामिनी से करवाती है।

अंजलि : कामिनी यह निशा है, सेक्शन “अ” में पढती है ।

कामिनी : हाँ मैंने निशा को स्कूल में देखा है ।

हेल्लो निशा (कामिनी मुस्कुराते हुए)………..

निशा: हेल्लो ….।।।।

कुछ दिनों बाद जब कामिनी की तबियत ठीक हो जाती है तब वह स्कूल जाना शुरू करती है और तभी उसकी मुलाकात निशा से होती है।

कामिनी: हेल्लो निशा……।

धन्यवाद् तुम अंजलि के साथ मेरे घर नोट्स देने आई ।

निशा : कोई बात नही, तुम धन्यवाद मत बोलो ।

कामिनी : क्या हम दोस्त बन सकते हैं….?

निशा : क्यू नहीं । हम अब से दोस्त हैं।

अब कामनी और निशा दोनों आपस में खूब बातें करते थे, साथ खेलते थे, घूमते थे। दोनों को एक दुसरे का साथ इतना अच्छा लगने लगा कि कुछ ही दिनों में वो बहुत ही अच्छे और करीबी दोस्त बन गए। उन दोनों का एक दुसरे के घर आना जाना भी शुरू हो गया।

निशा एक बहुत ही भावुक लड़की थी, वह हमेशा कामिनी का साथ देती थी और यही आशा रखती थी कि जरूरत पड़ने पर कामिनी भी उसका साथ जरुर देगी। निशा को अपनी करीबी दोस्त कामिनी पर विशवास था।

देखते ही देखते बोर्ड परीक्षा का समय नजदीक आने लगा। दोनों पढाई में जुट गए पर दोनों को यह डर भी था कि बोर्ड परीक्षा के बाद उन दोनों को अपना स्कूल बदलना पड़ेगा और कहीं वो अलग-अलग स्कूल में न चले जायें । एक ही स्कूल में दाखिला लेने के लिए उन्होंने जोर शोर से परीक्षा की तयारी करनी शुरू कर दी जैसे ही परीक्षा समाप्त हुई निशा और कामिनी खेल-कूद और मोज मस्ती में लग गए।

कुछ दिनों बाद……………………………………..

निशा (फ़ोन पर): हेल्लो कामिनी ।

कामिनी : हेल्लो……!!! तुम कैसे हो ?

निशा: मै ठीक हूँ ।  तुम कैसे हो ?

कामिनी: मै भी ठीक हूँ।

निशा : आज परीक्षा का परिणाम आने वाला है, मुझे तो डर लग रहा है।

कामिनी : अब तुम तो मत ही डरो। अगर तुम्हारे जैसे अवल आने वाले डरेंगे तो बाकि विद्यार्थियों का क्या होगा?

निशा : ठीक है। मेरा रोल नंबर तुमको पता ही है, जैसे ही परिणाम आ जाये मुझे फ़ोन पर बता देना।

कामिनी: ठीक है।

थोड़ी देर बाद……………………………

कामिनी : हेल्लो निशा ………!

निशा: हेल्लो…….!!

कामिनी : तुमने 77% अंक प्राप्त किए।

निशा: और तुमने?

कामिनी: 70%।

निशा: मुबारक हो।

कुछ ही दिनों बाद दोनों ने आगे की पढाई के लिए फॉर्म भरा। निशा और कामिनी को एक ही स्कूल में दाखिला तो मिल गया पर दोनों के विषय अलग होने के कारण वो लोग अलग-अलग सेक्शन में चले गये। निशा के नए स्कूल में और उसके ही सेक्शन में एक ऐसे लड़की (ममता) भी थी जो पहले से निशा के साथ उसके पुराने स्कूल में पड़ती थी और कामिनी को भी जानती थी।

निशा और कामिनी का सेक्शन अलग होने की वजह से अब वो दोनों सिर्फ लंच के समय ही मिल पाते थी। एक दिन निशा और कामिनी लंच के समय मिले और बातें करने लगे तभी अचानक कामिनी ने कुछ ऐसा कहा कि निशा हैरान हो गई:-

कामिनी: तुम्हारे सेक्शन में जो ममता पढती है…………!

निशा : हाँ पढती है। क्या हुआ उसे?

कामिनी: वो बोल रही थी कि निशा ने मेरे स्कूल बैग से पैसे चोरी किए हैं।

निशा: ये क्या बकवास है। कामिनी क्या तुम ममता पर विश्वास करती हो ?

कामिनी: नहीं-नहीं बिलकुल नहीं। मैंने तो तुमको सिर्फ वो बताया जो ममता ने मुझे बोला।

निशा: मुझे इस बारे में ममता से बात करनी है। मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया और मै इतना बड़ा इलज़ाम अपने ऊपर नहीं ले सकती। कामिनी तुमको मेरी मदद करनी पड़ेगी और ममता के सामने ये बोलना पड़ेगा कि उसने ही तुमको ये बात बताई है कि उसके बैग से पैसे मैंने चोरी किए है।

कामिनी: हाँ ठीक है। पर अभी नहीं, अभी मेरी क्लास का समय हो गाया।

निशा: ठीक है।

अगले दिन स्कूल में लंच के समय……………………………

निशा: ममता क्या तुमने कामिनी को यह बोला है कि मैंने तुम्हारे स्कूल बैग से पैसे चोरी किए है?

ममता: नहीं।

निशा : झूठ मत बोलो मुझे कामिनी ने सब कुछ सच सच बता दिया है और मुझे कामिनी पर पूरा विश्वास है।

ममता: नहीं मैंने ऐसा कुछ नही बोला।

निशा: ठीक है। रुको मै अभी कामिनी को बुलाती हूँ अब वो ही बताएगी सब कुछ।

निशा, कामिनी के पास गई जो अपनी कुछ अन्य सहेलियों से बातें कर रही थी …………………………..

कामिनी तुम अभी मेरे साथ चलो, मुझे कल वाली बात ममता के सामने पूछनी है।

कामिनी : एक मिनट मैं आती हूँ ।

निशा : मै तुम्हारा इंतज़ार कर रह हूँ।

      10 मिनट बाद…………..

निशा : कामिनी मुझे तुम्हारी मदद की जरूरत है। मेरे साथ जल्दी चलो, लंच का समय ख़तम होने वाला है।

कामिनी : हाँ हाँ मै आ रही हूँ………

निशा: इतनी बड़ी बात हैं मेरे लिए और शायद तुम्हारे लिए भी कि तुम्हारी इतनी करीबी सहेली पर किसी ने इतना बड़ा इलज़ाम लगाया है और मेरी मदद करने की जगह तुम यहाँ अपनी सहेलियों के साथ बातें कर रही हो। क्या ये बात तुम्हारे लिए कोई महत्व नहीं रखती?

कामिनी : हाँ बड़ी बात है मेरे लिए भी, पर अभी यहाँ इससे भी ज्यादा महतवपूर्ण बात चल रही है। तुम अभी यहाँ से जाओ।

निशा: इस बात से जयादा महतवपूर्ण तुम्हारे लिए क्या हो गया कि तुम इतनी गहरी दोस्ती के लिए भी तुम्हे इतना सोचना पड़ रहा है। कामिनी तुम इतना सोच रही हो मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा। मुझे तो तुम्हारे चेहरे पर ममता के प्रति कोई गुस्सा ही नज़र नहीं आ रहा। मुझे तो ऐसा लग रहा है कि तुम बस यही इतंजार कर रही हो कि कब लंच का समय खत्म हो और मै यहाँ से जाऊ। ठीक है ……….!!! कामिनी जैसे तुम्हारी मर्ज़ी पर मुझे ये बात हमेशा याद रहेगी कि तुमने मेरा साथ न दिया।

एक बात और सुन लो कामिनी अगर मैं तुम्हारी जगह होती और मुझे कोई ये बोलता कि तुम्हारी सहेली कामिनी ने मेरे पैसे चोरी किए है तो मैं न जाने उसके साथ क्या करती। तुमने तो मेरे बारे में ये सब बातें सुन कर और मेरे द्वारा तुमसे मदद मागने पर भी कुछ नही किया। आज के बाद मै तुमसे कभी बात नही करुँगी। हमारी दोस्ती यहीं तक थी। अलविदा…………………………….!!!!!!!!!!!!!!!!

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8 comments

  1. आपके द्वारा लिखी गई यह कहानी हमें बहुत पसंद आई, यह बहुत ही दिलचस्प कहानी हैै, आप आगे भी अच्छी-अच्छी कहानियाँ लिखते रहना |

    Liked by 1 person

  2. Never Give Up – कभी हार मत मानो

    बीच रास्ते से लौटने का कोई फायदा नहीं क्योंकि लौटने पर आपको उतनी ही दूरी तय करनी पड़ेगी जितनी दूरी तय करने पर आप लक्ष्य तक पहुँच सकते है|

    “अधिकतर लोग ठीक उसी समय हार मान लेते है, जब सफलता उन्हें मिलने वाली होती है| विजय रेखा बस एक कदम दूर होती है, तभी वे कोशिश करना बंद कर देते है| वे खेल के मैदान से अंतिम मिनट में हट जाते है, जबकि उस समय जीत का निशान उनसे केवल एक फुट के फासले पर होता है|”

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