*मेरे कॉलेज का पहला दिन- भाग 1*

जब मैंने इंटर की परीक्षा अच्छे नम्बरों से पास की तो घर में सब बहुत ही खुश थे और मुझे भी यह सोचकर बड़ी ही प्रसन्नता हो रही थी कि अब मैं भी कॉलेज जाऊंगा। मेरठ के एक कॉलेज में मुझे दाखिला मिला गया और अब वहीँ रह कर मुझे  आगे की पढाई करनी थी।

16 अगस्त 2006 का वह दिन मुझे आज भी याद है जब मैं घर से स्टेशन के लिए निकला। मेरी ट्रेन करीब 7:30 बजे की थी। मुझे स्टेशन तक छोड़ने के लिए माँ और पिता जी भी साथ आए थे। कुछ ही देर बाद ट्रेन सामने से आती हुई नज़र आई और जैसे ही मैंने ट्रेन पकड़ने के लिए कदम आगे बढ़ाया, माँ की आँखों से आंसू छलकने लगे पर पिता जी ने अपनी भावनाओ को अन्दर ही दबा रखा था, ना चाहते हुए भी भरे मन के साथ जैसे-तैसे मैंने उनसे विदा ली और आशीर्वाद लेकर निकल पड़ा।

ट्रेन अब मेरठ के लिए निकल पड़ी थी और मैं सफ़र का आनंद लेने लगा। कुछ ही घंटों के सफ़र में रात के खाने का समय हो गया था। मैंने अपने बैग से डिब्बा निकाला और माँ के हाथ का बना हुआ खाना खाने लगा। इसके बाद मैं थोडा थका हुआ महसूस करने लगा पर जैसे ही मैंने सोने की तैयारी की मुझे घबराहट होने लगी। स्कूल के दिनों में मैंने कॉलेज में पुराने विद्यार्थियों दवारा नए विद्यार्थियों के साथ होने वाली रैगिंग के बारे में सुना था और यही सोच कर मेरी नीदं जैसे हवा में उड़ गई थी।

17 अगस्त, करीब सुबह 8:30 बजे मैं हास्टल पंहुचा। नया शहर और नए लोगो को देख कर मुझे बहुत ही अजीब सा लग रहा था। वहाँ पहुँचते ही सबसे पहले मेरी मुलाकात गार्ड से हुई…….

गार्ड: फर्स्ट ईयर?

मैं: जी……………….हाँ………….(घबराते हुए) ……………………!!

गार्ड: फर्स्ट ईयर के विद्यार्थियों की बिल्डिंग बाएँ तरह है। आप दूसरी तरफ न जाएँ।

मैं : ठीक हैं …. धन्यवाद्।

मैं अपने हॉस्टल की बिल्डिंग की तरफ निकल पड़ा। वहां जाकर मैंने देखा कि एक ही कमरे में दो विद्यार्थियों के रहने की व्यवस्था की गई थी। कमरे में जाकर मैंने अपना बैग अलमारी में रखा और उत्सुकता से अपने नए पलंग का चुनाव कर अपने रूम पार्टनर का इंतजार करने लगा। करीब आधा दिन बीत जाने के बाद किसी ने कमरे का दरवाजा खटखटाया। मैंने जैसे ही दरवाजा खोला और देखा कि मेरे सामने मेरा एक पुराना मित्र अपना बैग और संदूक लेकर खड़ा था। यह सोच कर मैंने थोड़ी राहत की सांस ली कि मेरा रूम पार्टनर कोई दूसरा नही बल्कि मेरा ही एक पुराना मित्र था। ज्यादा लंबा सफ़र करने के कारण हम इतना थक चुके थे कि जैसे ही पलंग पर लेटे और कब आँख लग गई, दोनों को कुछ पता न चला। दिन ऐसे ही बीत गया और जब हमारी आँख खुली तो शाम हो चुकी थी। कमरे से बाहर निकलने पर बाकी विद्यार्थियों ने हमें बताया कि फर्स्ट ईयर के विद्यार्थियों का भोजनालय सेकंड और थर्ड ईयर के विद्यार्थियों के साथ ही है। इस बात का पता चलते ही किसी की हिम्मत न हुई कि उनके भोजनालय जाकर खाना खाते। सबको रह रह कर रैगिंग का डर सता रहा था परन्तु भूख इतनी तेज़ लगी थी कि अंततः किसी से भी रहा न गया और सभी ने एकजुट होकर भोजनालय जाकर खाना खाने का फैसला किया।

हम सभी अभी सेकंड और थर्ड ईयर के विद्यार्थियों की बिल्डिंग में पहुँचे ही थे कि पीछे से आवाज़ आई …………

फर्स्ट ईयर…………..?

हम सभी के कदम एकदम रुक गए और सभी मौन हो गए। फिर से किसी ने पीछे से आवाज़ दी………… फर्स्ट ईयर …………………..?

इस बार हम सभी ने हाँ का इशारा करते हुए सिर हिलाया………। बस फिर क्या था, रैगिंग का सिलसिला वहीँ से ही शुरू हो गया। सेकंड और थर्ड ईयर के विद्यार्थियों ने हम सभी को एक पंक्ति में खड़े होकर उनके पीछे आने के लिए कहा। हम सभी पंक्ति बनाकर उनके पीछे पीछे चलने लगे। कुछ दूर चलने के बाद वह हमे नाई की एक छोटी सी दुकान पर लेकर गए और नाई को केवल “जीरो कट” कह कर समझा दिया कि आखिर हम लोगो के साथ करना क्या है…..??

उस समय तक मैंने कभी भी जीरो कट के बारे में नही सुना था। मुझे जिज्ञासा हो रही थी कि आखिर ये जीरो कट होता क्या है………….??????? कुछ मिनट मैं सोचता रहा और जब मुझसे रहा न गया तब मैंने नाई से पूछा ……………

मैं: ये जीरो कट क्या हैं?

नाई: जब हो जाएगा तब आपको पता चल जाएगा।

उस दिन दुर्भाग्यवश मैं ही पहला विद्यार्थी था, जिसका जीरो कट किया गया। जीरो कट पूरा होने के बाद जब मैंने अपने आप को शीशे में देखा तब अपने सिर पर एक भी बाल न देख कर मुझे पहले तो बहुत बुरा महसूस हुआ पर जब मैंने बाकी विद्यार्थियों की तरफ देखा तो यह सोच कर मुझे थोडा सुकून मिला कि अब यही उन सभी के साथ होने वाला था। जब सभी विद्यार्थियों का जीरो कट हो गया तब मैं सोचने लगा, “क्या इसके पैसे भी अब हम से ही लिए जायेंगे……..?” इतने में थर्ड ईयर के एक विद्यार्थी ने नाई से पूछा “कितने पैसे हुए? ” नाई ने जवाब दिया 60 रूपए तब मेरे मन में ख्याल आया इतना सस्ता जीरो कट……….??

पर इतने पर भी उनका मन न भरा और वह हमे कॉलेज के खुले मैंदान में लेकर गए जहाँ उन्होंने हमसे दंड-बैठक, कब्बडी, मिट्टी में लोटपोट, नृत्य, संगीत और भी बहुत सी चीज़े अपने अंदाज़ में करवाई।

रैगिंग के बाद हम सब इतना थक चुके थे और सभी को जोरो की भूख लगी थी कि जैसे ही हमे खाना खाने के लिए स्वीकृति मिली, हम लोग भूखों की तरह खाने पर टूट पड़े। उस दिन खाना खाने के बाद मैं और मेरा मित्र जैसे ही कमरे में पहुँचे बस यही सोचने लगे कि अब कल क्या होगा…………??????

 

Advertisements

2 comments

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s